स्मृतियां
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महकती स्मृतियां
उन दिनों मैं डाॅक्टर बन नौकरी के पदस्थापन की प्रतीक्षा में थी। कुछ दिनों में, एक सुदूर ग्रामीण इलाके में पदस्थापन का समाचार मिला।
इसके पहिले कभी किसी गांव के दर्शन करने का सुयोग ना बना था। गांव का नाम भी अजीब था, 'सांडेराव'।
एक बैग में आवश्यक सामान डाल मैं गंतव्य के लिए रवाना हुई। बस से उतरी तो पाया कि नाम को सार्थक करते दो- चार खतरनाक सांड सींग भिड़ा लड़ने में व्यस्त थे। खैर, उनसे किनारा कर मैं रास्ता पूछते- पूछते अपने अस्पताल जा पहुंची।
पास के ही एक छोटे से सरकारी आवास में, मेरे रहने की व्यवस्था हो गई। दो दिन बाद, आधी रात को मेरे क्वाटर का दरवाजा खड़खड़ाया गया।
"डाॅ साहिबा, घर चलिए, डिलिवरी करानी है।" एक बड़ी- बड़ी मूंछों वाला लट्ठ पहलवान निवेदन कर रहा था।
मैंने गर्भवती को अस्पताल लाने के लिए कहा लेकिन उनने असमर्थता जताई। मरती क्या ना करती, हो गई उनके द्वारा लाये गये ट्रेक्टर में सवार। मेरे लिए यह भी नवीन अनुभव था।
चारों ओर स्निग्ध शीतल चांदनी का साम्राज्य था। गांव की शांत , प्रदूषण रहित,गलियों में विचरने का यह प्रथम अवसर था।
जुड़वा बच्चों का प्रसव पूरा करा, मैं ढेर सारी आशीष सहित लौट आई।
धीरे- धीरे गांव में मेरी पहचान बन गई। हेडक्वाटर पर, दिन- रात ड्यूटी करने वाली, उन दिनों ,मैं इकलौती महिला - चिकित्सक थी उस क्षेत्र की।
सर्दियों में ,मेरे मकान के आस पास मक्की का आटा पका पापड़ बनाये जाते, जिसकी सुगंध पूरे वातावरण में पसर जाती। सबसे पहले वे खींचे पापड़ मुझे ही पहुंचाये जाते।
सुबह- सवेरे दूध वाला हांक लगाता। दूध के साथ ढेर सारी ताजी ,स्वादिष्ट छाछ दे जाता। मैं उसके अलग से पैसे देने लगती तो साफ मना कर देता कि हम लोग छाछ के पैसे नहीं लेते। शहर में तो पेयजल तक क्रय करना पड़ता था। शीतलाष्टमी पर ,सुस्वादु हलुवा, पूरी, पकौड़े, खीरआदि से भरे थाल आ जाते।
गर्मियों में , बिजली न होने पर बरगद के घने वृक्ष के तले मेरा आउटडोर चलता। शाम को मरीज देखने के पश्चात,टहलने निकल जाती। चारों ओर हरेभरे खेत , ताल, तलैया देख मन विमुग्ध हो जाता। पहाडों के पीछे होते सूर्यास्त को तसल्ली से देखने का अवसर मिला।
रास्ते में कुछ लोग तो, पैर छू प्रणाम करने लग जाते। मैं संकुचित हो जाती क्योंकि अधिकतर मुझसे उम्र में बड़े होते।
अस्पताल से कुछ दूर एक भग्न किन्तु सुन्दर सा किला भी था। मैं कई बार उसके आसपास की नर्म दूब पर शाम होने तक, बैठ उपन्यास पढ़ती।
आस पास के क्षेत्रों में कैम्प होते। मैंने देखा मेरे नर्सिंग कर्मचारी कहीं भी दो पत्थर जोड़ चूल्हा बनाते, आसपास पेड़ों,की टहनियों को सुलगाते व साथ लाये सामान से चाय बना डालते मिनिटों में।
लौटते समय धूल उड़ाती मेरी सरकारी गाड़ी के पीछे दूर तक ,ग्रामीण बच्चे 'टाटा ' करते , मुझे विदा करते भागते हुए।
एक वर्ष पश्चात ,पति के कहने पर, मैंने गांव की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। किन्तु गांव में मिला स्नेह आदर मेरे जीवन की अमर स्नेह पुंजी है।
-डाॅ महिमा श्रीवास्तव
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