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कविता
क्यूँ फागुन में उदास रहूँ
सावन आया,
मन सूखा रह गया
जाड़े आये,
तपता रहा मन बावरा।
बसंत भी ना
खिला पाया फूल दिल के
ओ फागुन ,
बेरंग ना छोड़ जाना इस बार।
लाख निराशा के घेरे रहे चारों ओर
मैंने तो
आशा को गाना ही सीखा है।
रूखे लोगों की
भीड़ में सरस सरल रहूँ
ओ फागुन
तू पलाश मन वन उगाना।
मेरे गीत
मौसम की मार से
भ्रमित हों ना।
मन में
फाग की गूंज बनी रहे आजीवन,
जो बिसरायें
उनको भी नेह का गुलाल भेजूं
मैं क्यूँ फागुन में उदास रहूँ ?
डाॅ.महिमा श्रीवास्तव
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